दिल में कहीं एक दर्द है, टीस है मगर उसे बयां करने का तरीका नहीं सूझ रहा है... पर क्या करूँ अपनी आदत से मजबूर हूँ, इसीलिए एक पर्यास जरुर करूँगा... मैं या आप ही नहीं इस दुनिया में हर कोई अपने आपको धोखा दे रहा है... आखिर क्यूं सच्चाई को कबूल करना इतना मुश्किल हो जाता है... सफलता के नाम पर हर कोई एक दुसरे के कंधे पर पैर रखकर ऊपर जाने का पर्यास कर रहा है, मगर कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि वो ऊंचाई छूने की बजाय गर्त में समाता जा रहा है... दुसरे को शिक्षा देने के लिए तो सब तैयार नजर आते हैं मगर खुद को सुधारने के सवाल पर सबको सांप सूंघ जाता है... व्यवसायीकरण की इस अंधी दौड़ में भाव को तो सब समझ रहे हैं मगर भावनाओं को कोई भी समझने को तैयार नहीं है... लम्बे चौड़े दावे करने वाले असल में अन्दर से पूरी तरह खोखले हो चुके हैं... जो कोई धरातल पर थोडा बहुत काम करने का पर्यास करता है उसे इतना कमजोर करने का पर्यास किया जाता है कि वह मैदान छोड़ कर भागने के लिए मजबूर हो जाये... राजनेताओं को हम सब गालियाँ देने में सबसे आगे होते हैं, मगर क्या हमारे अंदर उनको सुधारने की कुव्वत नहीं है?... मेरे हिसाब से है बिलकुल है मगर क्या करे दुनियादारी के दस्तूर से बंधे हुए हैं, सिर्फ दुसरे को जिम्मेवार ठहरा कर अपने कर्त्तव्य की गठरी को उसके दरवाजे फैंक कर आगे निकल लेते हैं, जैसा की रोज सुबह-२ अधिकतर महिलाये घर के कूड़े-कचरे के साथ करती हैं... अपने अधिकारों के लिए दिन-रात गला फाड़-फाड़ के चिल्लाने वाला इंसान सदा अपनी जिम्मेवारियों से बचने की जुगत में क्यूँ लगा रहता है?... क्यूंकि हम सिर्फ लेने के आदि हो चुके हैं, देने का पर्याय तो हम लगभग भूल चुके हैं... इस दुनिया में न तो मुद्दों की कोई कमी है और ना ही इन मुद्दों को भुनाने वालों की, हर कोई गिद्ध सी आँख गडाए बैठा है कि अपना नंबर कब आएगा?... खैर जीवन कि आपाधापी और कामयाबी की लालसा में हम सही और गलत, अच्छे और बुरे, अपने और पराये, जैसे कई भेद भूलते जा रहे हैं... शायद इसे ही पतन कहते हैं जिसे हम जी रहे हैं... मैं जिंदगी को सिर्फ लड़ाई-लड़ाई-लड़ाई यानी संघर्ष का पर्याय मानता था, मगर अब लगने लगा है कि जिंदगी इससे भी बढ़कर बहुत कुछ है... शायद आप सही हैं और मैं गलत हूँ, आप अच्छे हैं और मैं बुरा हूँ, शायद आप मेरे अपने हैं और मैं आपके लिए पराया हूँ... लेकिन एक कडवा सच ये भी है कि ज़िन्दगी तब तक ही है जब तक मैं जिन्दा हूँ... और जब तक जिन्दा हूँ तब तक संघर्ष जारी रहेगा...
Tuesday, May 29, 2012
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